नज़ारा -Old blog post

नज़ारा
कल मैंने एक फ़ोटो में दो आँखें देखीं,
उन आँखों में उमड़ता एक सैलाब देखा,
आकांषाओं का जलता एक दरिया देखा,
उन आँखों में दुनिया घूमती नज़र आ रही थी,
देखी प्रीत की मूरत उन नयन में,
ममता का भरा वो अम्बार देखा,
वहीँ वासना भी कुछ छलक रही थी,
और कुछ स्वाभिमान का गर्व दिखा था,
एक पल में वो बेटी सी थी,
एक पल में वो माँ दिखी थी,
कुछ षण बीवी कुछ षण बहु,
कुछ लम्हे वो एक स्त्री सम्पूर्ण लगी,
गौर से देखा उन आँखों में,
तो एक रक्तबिन्दु सा प्रतीत हुआ,
कई जलते अरमान दिखे,
कई घुटती इच्छाएं दिखीं,
थोड़ी सी वह प्यासी लगी,
अपनों से स्नेह सम्मान पाने को,
खुद से कुछ कर जाने को,
रिश्तों को जीते जीते खुद कुछ वक़्त जी जाने को।

This happens to be my first blog, reblogging again for Dhwani to read.

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39 thoughts on “नज़ारा -Old blog post

  1. Omg, you made me cry, so subtle, crisp and to the point, you defined a girl’s POV splendidly Dhiraj, I could feel all the emotions that you drafted in this little wise piece, super awesome Dhiraj 🙂 🙂 🙂 🙂

    Liked by 3 people

    1. हाहाहा मैं तो अभी भी कोशिश में लगा हूँ नारी और नारित्व को समझने की!
      आपकी जिज्ञासा और कुतूहल को सलाम।

      Liked by 1 person

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